बिलासपुर (समाचार मित्र) शराब के अवैध कारोबार पर कार्रवाई करने वाली आबकारी टीम अब खुद गंभीर आरोपों के घेरे में घिरी है। पीड़ित परिवार का दावा है कि करीब तीन महीने पहले दयालबंद मधुबन स्थित उनके घर, जहां किराना दुकान संचालित होती है, आबकारी टीम पहुंची और पूरे घर की जांच- पड़ताल की। परिवार के अनुसार कुछ नही मिला, इसके बावजूद पानी डिस्पोजल के नाम पर कार्रवाई का हवाला देकर कुछ कोरे दस्तावेजो पर साइन कराए गए और 5000 हजार नगद ले लिए गए। डर और शिक्षा के अभाव में परिवार ने पैसे भी दे दिए और दस्तावेजो पर हस्ताक्षर भी कर दिया।

पीड़ित रामचरण मानिकपुरी, उनकी पत्नी जगिया बाई और पुत्र जयशु के अनुसार, गुरुवार दोपहर आबकारी दफ्तर से कमलेश देवांगन का फोन आया कि “आपको साहब ने बुलाया है।” इसके बाद रामचरण मानिकपुरी अपनी पत्नी जगिया बाई और पुत्र जयशु के साथ आबकारी कार्यालय पहुंचे।
परिवार का आरोप है कि वहां वेद नेताम चालान पेश करने के लिए फिर से 25 हजार की मांग करने लगे। पैसे देन में असमर्थता जताने पर डांट- फटकार शुरू हो गई। पुत्र जयशु ने 500 निकालकर कहा कि “साहब, हमारे पास बस इतना ही है, जिसके बाद कथित तौर पर माहौल बिगड़ गया।
आबकारी अधिकारी पर आरोप वेद नेताम
परिवार का आरोप है कि जयशु को घसीटकर केबिन की ओर ले जाया गया और उसके साथ मारपीट की गई। बेटे को बचाने पहुंचे पिता रामचरण मानिकपुरी और मां जगिया बाई के साथ भी कथित रूप से धक्का-मुक्की कर उन्हें वहां से भगा दिया गया।
इसके बाद जयशु ने वीडियो बनाना शुरू किया तो आबकारी अधिकारी कथित तौर पर भड़क गए और मोबाइल छीनने की बात कहने लगे। आहत परिवार नेहरू चौक पहुंचा, जहां मीडिया कर्मियों को अपनी आपबीती बताई। इसके बाद मीडिया कर्मी भी परिवार के साथ आबकारी दफ्तर पहुंचे।
वीडियो में दिख रही कथित महिला आखिर कौन थी और आबकारी दफ्तर में किस हैसियत से पहुंची थी? पीड़ित और मीडिया के बीच उसका क्या काम था—क्या वह मामले को “मैनेज” करने पहुंची थी? क्या आबकारी कार्यालय में ऐसे मामले रोज सामने आते हैं, जिन्हें दबाने या मैनेज करने के लिए इस तरह के लोगों का सहारा लिया जाता है? अब सवाल यह है कि इस पर कार्रवाई होगी या विभाग में इसी तरह का खेल चलता रहेगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर तीन महीने बाद रामचरण मानिकपुरी के पूरे परिवार को आबकारी कार्यालय बुलाने की आवश्यकता क्या थी? यदि कोई वैधानिक कार्रवाई या चालान की प्रक्रिया थी तो फोन कर परिवार को कार्यालय बुलाने और फिर पैसे की मांग करने की स्थिति क्यों बनी?
पीड़ित परिवार के आरोपों ने आबकारी विभाग की पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या विभाग के अफसर अपने कर्मचारियों जांच करेंगे या मामले को रफा दफा करने में सहयोग करेंगे यह तो देखना होगा? आखिर कार्यालय बुलाने की जरूरत क्या थी और वहां ऐसा क्या हुआ कि मामला पैसे की मांग, मारपीट और मोबाइल छीनने तक पहुंच गया।
पीड़ित परिवार के आरोप हैं,
अब सवाल उच्च अधिकारियों और शासन-सत्ता से है—क्या गरीब और आम आदमी की सुनने वाला कोई है? यदि आरोप सही हैं तो क्या यह किसी तरह का आर्थिक दोहन नहीं? क्या सरकार वसूली के इन आरोपों पर कार्रवाई करेगी, या फिर जिम्मेदारों को खुला छोड़ दिया जाएगा? सवाल यह भी है कि कहीं इसी तरह कई बेगुनाहों के साथ भी ऐसा व्यवहार तो नहीं हो रहा?


