छत्तीसगढ़/ बिलासपुर (समचार मित्र) बिलासपुर 02 सितंबर 2026 भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के मामलों में दंपति को एक-दूसरे की आय व संपत्ति से जुड़े शपथ पत्र पर जिरह करने का पूरा अधिकार है। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच ने यह अहम व्यवस्था दी है। कोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पति को अपनी पत्नी की आय के स्रोतों पर सवाल पूछने से रोक दिया था।
रायपुर निवासी एक महिला ने अपने पति के खिलाफ दुर्ग फैमिली कोर्ट में बीएनएसएस की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का आवेदन लगाया है। सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘रजनेश विरुद्ध नेहा’ फैसले के निर्देशों के तहत महिला ने अपनी आय और संपत्ति का शपथ पत्र कोर्ट में पेश किया था। जब पति के वकील ने शपथ पत्र में दी गई जानकारी और आय के स्रोतों पर की जिरह शुरू की, तब फैमिली कोर्ट ने उन्हें ऐसे सवाल पूछने से रोक दिया।
फैमिली कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
याचिका की सुनवाई जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता क अधिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष तर्क देते हुए कहा, पत्नी की आय और संपत्ति के विवरण पर सवाल पूछने से रोकने पर वह प्रभावी ढंग से अपना पक्ष नहीं रख पाएंगे। यह निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के विपरीत है। हाई कोर्ट ने पति की को याचिका स्वीकार करते हुए दुर्ग फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि 11 सितंबर की सुनवाई में पति को जिरह की अनुमति दी जाए।
जानिए क्या है गुजारा भत्ता का प्रावधान व नियम?
सीआरपीसी की धारा 125 की जगह अब BNSS की धारा 144 में पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण का प्रावधान है। नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद इसने सीआरपीसी की धारा 125 की जगह ली है। पर्याप्त साधन होने के बावजूद आश्रितों की उपेक्षा करने या उनका खर्च उठाने से इंकार करने पर कोर्ट मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दे सकती है। इसके दायरे में अपना खर्च उठाने में असमर्थ पत्नी, अवयस्क या शारीरिक-मानसिक रूप से अक्षम बच्चे और माता-पिता आते हैं।

