नई दिल्ली (समाचार मित्र) अगर आपने ड्राइवर, नौकर, रिश्तेदार या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के नाम पर संपत्ति खरीदी है तो उसे जब्त किया जा सकता है। दरअसल, बेनामी संपत्तियों के जरिए काला धन छिपाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा संदेश जारी किया है।
शुक्रवार को दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आयकर विभाग 2016 से पहले किए गए बेनामी लेनदेन के मामलों में भी संपत्तियों को जब्त कर सकता है। इकनॉमिक टाइम्स के मुताबिक इस फैसले के बाद अब वे लोग भी जांच के दायरे में आ गए हैं जिन्होंने अपने ड्राइवर, कुक या किसी अन्य व्यक्ति (बेनामीदार) के नाम पर जमीन, घर या नकद संपत्ति छिपा रखी थी।
कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 के बेनामी संशोधन कानून की व्याख्या करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। इनमें ये प्रमुख हैं:
1. पिछली तारीख से लागू
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेनामी संपत्ति कानून, 1988 में साल 2016 के संशोधन का वह हिस्सा जो प्रक्रिया, जांच और संपत्ति जब्ती से जुड़ा है, उसे पिछली तारीख से लागू किया जा सकता है।
इसका मतलब है कि नवंबर 2016 से पहले के बेनामी सौदों की संपत्तियां भी अब सरकार जब्त कर सकती है।
2. सजा का प्रावधान
अदालत ने साफ किया कि नवंबर 2016 से पहले हुए बेनामी सौदों में संपत्ति जब्त की जा सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में संशोधित कानून के तहत 7 साल की सजा नहीं दी जाएगी।
पुराने कानून के तहत अधिकतम 3 साल की सजा लागू हो सकती है और जुर्माना भी नहीं लगेगा।
3. वसीयत के सौदे भी जांच के दायरे में
अक्सर लोग बेनामी संपत्ति को कानूनी जामा पहनाने के लिए वसीयत का सहारा लेते थे।
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई संपत्ति बेनामी है तो उसे वसीयत या उत्तराधिकार के जरिए वास्तविक मालिक को हस्तांतरित करना अवैध माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे मामलों में मूकदर्शक नहीं बनी रहेगी।
बेनामी कानून के तहत सजा का प्रावधान
संपत्ति की जब्ती।
संपत्ति के बाजार मूल्य का 25% तक जुर्माना।
7 साल तक की जेल (2016 के बाद के मामलों में)।
क्यों अहम है यह फैसला?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से इनकम टैक्स विभाग को 2-3 दशक पुराने संदिग्ध मामलों को फिर से खोलने की शक्ति मिल गई है। अब विभाग केवल कागजों को नहीं देखेगा, बल्कि सौदे की असली प्रकृति की जांच करेगा। Asire Consulting के मैनेजिंग पार्टनर राहुल गर्ग ने कहा कि अब संदेश साफ है कि भले ही व्यक्ति बच जाए, लेकिन संपत्ति खतरे में रहेगी।
मामला क्या था?
यह मामला मंजुला और अन्य बनाम डी. ए. श्रीनिवास से जुड़ा था। इसमें एक व्यक्ति ने वसीयत के आधार पर कुछ संपत्तियों के मालिकाना हक का दावा किया था। जांच में सामने आया कि ये संपत्तियां दरअसल भूमि सुधार कानूनों से बचने के लिए दूसरे के नाम पर खरीदी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया और सरकार को 8 हफ्तों के भीतर इन संपत्तियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश दिया।

