छत्तीसगढ़ (समाचार मित्र) आज छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति में भोजली तिहार है जिसका राज्य की लोकसंस्कृति में एक विशेष स्थान है। यह केवल एक धार्मिक या पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, आपसी प्रेम, मैत्री और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक माना जाता है। भोजली की परंपरा विशेष रूप से महिलाओं, युवतियों और बेटियों से जुड़ी हुई है।
ऐसे मनाया जाता है भोजली तिहार
भोजली पर्व के दौरान महिलाएं और युवतियां छोटी-छोटी टुकनियों में मिट्टी भरकर धान, गेहूं, जौ, कोदो सहित विभिन्न अनाजों के बीज बोती हैं। इसके बाद नियमित रूप से भोजली की सेवा-पूजा की जाती है और पारंपरिक भोजली गीत गाए जाते हैं। धीरे-धीरे जब इन बीजों से हरी-भरी पौध निकलती है तो उसे ही भोजली कहा जाता है।
भोजली के साथ जुड़े लोकगीत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन गीतों में अच्छी फसल, पानी, हरियाली और सुख-समृद्धि की कामना दिखाई देती है।
भोजली है मैत्री का पर्व
भोजली तिहार की सबसे अनूठी परंपरा ‘भोजली बदना’ है। भोजली विसर्जन के बाद भोजली की पत्तियां एक-दूसरे के कान में लगाकर जीवनभर की मित्रता का रिश्ता बनाया जाता है। यही कारण है कि भोजली को छत्तीसगढ़ में मैत्री और भाईचारे के पारंपरिक पर्व के रूप में भी देखा जाता है।
विसर्जन के साथ पूरा होता है पर्व
भोजली को सिर पर रखकर महिलाएं और युवतियां पारंपरिक गीत गाते हुए नदी, तालाब या अन्य जलस्रोतों तक जाती हैं। वहां विधिवत भोजली का विसर्जन किया जाता है। इसके बाद भोजली की कुछ पत्तियां घर लाकर बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है और अपने प्रियजनों के साथ मैत्री का रिश्ता मजबूत किया जाता है।
भोजली तिहार छत्तीसगढ़ की उस लोकपरंपरा का प्रतीक है, जिसमें खेत-खलिहान, हरियाली, जल, प्रकृति और रिश्तों की मिठास एक साथ दिखाई देती है। बदलते समय के बावजूद भोजली के गीत और इसकी परंपराएं आज भी गांवों में लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान बनी हुई हैं।
भोजली के गीतों से गूंज उठता है गांव-गांव, मैत्री, भाईचारे और प्रकृति प्रेम का देता है संदेश। साथ ही किसानों की अच्छी फसल की कामना के लिए भोजली तिहार मनाया जाता है।

