नई दिल्ली ( समचार मित्र) सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के रियल एस्टेट बिल्डरों को सख्त चेतावनी देते हुए साफ कर दिया है कि प्रोजेक्ट ब्रोशर में किए गए वादों को केवल मार्केटिंग का पैंतरा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
शीर्ष अदालत ने कड़े शब्दों में व्यवस्था दी कि डेवलपर्स को घर खरीदारों के सामने पेश किए गए प्लान और दावों के हूबहू अनुरूप ही प्रोजेक्ट का निर्माण और डिलीवरी सुनिश्चित करनी होगी.
अदालत ने यह तल्ख टिप्पणी गुरुग्राम स्थित ‘डीएलएफ होम डेवलपर्स’ के ‘द प्राइमस’ आवासीय प्रोजेक्ट में जारी गंभीर अनियमितताओं पर सुनवाई के दौरान की. मूल प्रोजेक्ट प्लान में 24 मीटर चौड़ी जिस सड़क का भरोसा दिया गया था, वह जमीनी स्तर पर बड़े हिस्से से पूरी तरह गायब पाई गई. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डरों द्वारा नक्शों और सुविधाओं में किए जाने वाले इस तरह के मनमाने बदलावों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे खरीदारों के भरोसे के साथ खिलवाड़ करार दिया.
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि यह बदलाव ‘मामूली नहीं, बल्कि काफी बड़ा’ था और चेतावनी दी कि अगर अगली सुनवाई तक प्रोजेक्ट को ब्रोशर के मुताबिक नहीं किया गया, तो वह ‘उचित आदेश जारी करने की दिशा में आगे बढ़ेगा’.
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने सड़क के लिए जरूरी जमीन के मामले को संभालने और रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के चुनाव में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए असरदार कदम न उठाने पर हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों पर नाराज़गी भी जाहिर की.
इस हफ्ते की शुरुआत में जारी किया गया नया आदेश, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) की स्टेटस रिपोर्ट के बाद आया है. सुप्रीम कोर्ट ने CBI को 24-मीटर चौड़ी सड़क और नियमों के पालन व कथित गड़बड़ियों से जुड़ी अन्य शिकायतों की शुरुआती जांच करने का निर्देश दिया था. बेंच ने कहा कि नक्शों, तस्वीरों और अन्य सामग्री पर आधारित CBI की रिपोर्ट से “कोई शक नहीं” रह जाता है कि सड़क वैसी नहीं बनी है जैसा कि ओरिजिनल प्लान और ब्रोशर में दिखाया गया था.
सड़क के लिए तय 147-मीटर के हिस्से में से लगभग 52 मीटर हिस्से को ग्रीन पैच (हरियाली वाले इलाके) के तौर पर विकसित किया गया है. एक और बड़ा हिस्सा, जो सड़क जैसा दिखता है, उसका इस्तेमाल निवासी और आने वाले लोग पार्किंग के लिए कर रहे हैं. कोर्ट ने पाया कि नतीजतन, लगभग 100 मीटर – यानी पूरे हिस्से का लगभग दो-तिहाई – या तो ग्रीन पैच है या पार्किंग के लिए इस्तेमाल हो रहा है.
बेंच ने कहा, “हमें यह समझ नहीं आ रहा है कि बार-बार मौके दिए जाने के बावजूद – ताकि यह पक्का किया जा सके कि प्रोजेक्ट ब्रोशर में दिखाए गए विवरण के अनुसार हो – इस बदलाव को अभी तक ठीक क्यों नहीं किया गया है.” सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसकी चिंता सिर्फ सड़क तक ही सीमित नहीं है. उसने फिर से कहा कि कार्यवाही की शुरुआत से ही वह इस बात पर जोर दे रही है कि ग्राहकों को बेचा गया प्रोजेक्ट, DLF द्वारा संभावित खरीदारों/ग्राहकों को दिए गए ब्रोशर/प्लान में किए गए वादों के अनुसार ही बनाया और सौंपा जाना चाहिए.
कोर्ट ने CBI डायरेक्टर को निर्देश दिया कि वे शुरुआती जांच कर रहे सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस सौरभ गुप्ता की मदद के लिए दो और इंस्पेक्टर तैनात करें. साथ ही, एजेंसी की फाइनल रिपोर्ट का इंतजार करते हुए मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर तक टाल दी. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि CBI को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए और कोर्ट की कार्यवाही के दौरान की गई टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह कार्यवाही गुरुग्राम के सेक्टर 82A में स्थित ‘द प्राइमस’ (The Primus) नाम के एक रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट से जुड़े कंज्यूमर विवाद का हिस्सा है. DLF ने 2012 के आसपास इस प्रोजेक्ट की मार्केटिंग एक प्रीमियम हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के तौर पर शुरू की थी. इस प्रोजेक्ट का विज्ञापन अन्य सुविधाओं के साथ-साथ दो 24-मीटर चौड़ी एक्सेस सड़कों, बैंक्वेट सुविधाओं, टेनिस कोर्ट और स्विमिंग पूल के साथ किया गया था. जिन घर खरीदारों ने प्रोजेक्ट के बनने के दौरान अपार्टमेंट खरीदे थे, उन्होंने बाद में शिकायत की कि असलियत वैसी नहीं थी जैसा उन्हें बताया गया था.
यह विवाद सबसे पहले पांच खरीदारों की शिकायतों के बाद नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के सामने आया. कंज्यूमर बॉडी ने 29 मई, 2023 को अपना फैसला सुनाया, जिसके बाद घर खरीदारों और DLF होम डेवलपर्स, दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
खरीदारों ने कई बातों के अलावा यह आरोप लगाया कि प्रोजेक्ट असल में चारों तरफ से खेती की ज़मीन से घिरा हुआ था और वादे के मुताबिक बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर और पक्की सुविधाएं नहीं दी गई थीं. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि सही सड़कें, पानी और बिजली का इंफ्रास्ट्रक्चर न होने के बावजूद आंशिक ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट कैसे मिल गया. वहीं, DLF का कहना है कि अपार्टमेंट का कब्जा जरूरी पानी, बिजली और अन्य नियमों के पालन के साथ दिया गया था.
इस साल की शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट ने अपने सामने रखे गए सबूतों की जांच करने के बाद पाया कि कानूनी जरूरतों और जमीन पर असल स्थिति के बीच “बहुत बड़ा अंतर” था. 25 फरवरी के अपने आदेश में, बेंच ने कहा कि संभावित खरीदारों से किए गए वादे “शायद पूरी तरह से हकीकत में नहीं बदले”. हालांकि कोर्ट ने कहा कि यह मामला “सिर्फ़ एक बार हुई घटना” हो सकती है, लेकिन उसने सवाल उठाया कि संगठित रियल एस्टेट सेक्टर में ऐसे मामलों का आम उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमें यह मानने में मुश्किल हो रही है कि यह सिर्फ एक बार हुई घटना हो सकती है.” कोर्ट ने आगे कहा कि वह “ज्यादा चिंतित” है क्योंकि अगर संगठित रियल एस्टेट सेक्टर में ऐसी घटनाएं होती हैं, तो “हम आम उपभोक्ताओं की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं”. इसके बाद कोर्ट ने ‘बहुत सख्स रुख’ अपनाया और CBI को मामले की जांच करने का निर्देश दिया, जब एजेंसी ने जांच करने पर सहमति जताई. 21 जुलाई के आदेश में CBI को शुरुआती जांच का काम सौंपा गया, जिसमें खास तौर पर यह पता लगाने को कहा गया कि क्या प्रोजेक्ट से गुजरने वाली 24 मीटर चौड़ी सड़क का रखरखाव असल में सड़क के तौर पर किया जा रहा था या उसका स्वरूप बदल दिया गया था

