कोरबा (समाचार मित्र) कोरबा जिले में शासकीय मद से आम लोगों की सुविधा के लिए बनाए गए यात्री प्रतीक्षालय के निजी उपयोग में लिए जाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि करीब 7 लाख रुपये की लागत से निर्मित यात्री प्रतीक्षालय में यात्रियों के बैठने की सुविधा के बजाय सामान रखकर इसे निजी दुकान और गोदाम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रतीक्षालय का डिजाइन किसी भी सूरत में प्रतीक्षालय जैसा तो नजर नहीं आ रहा है जिससे ये प्रतीत होता है कि पहले से ही यात्री प्रतीक्षालय को निजी दुकान के रूप में काबिज करने का खेल किया गया।
मामला कोरबा जिले के करतला मुख्यालय का है जहां यात्री प्रतीक्षालय को निजी दुकान के रूप में कब्जा कर हथिया लिया गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस भवन का निर्माण सार्वजनिक उपयोग के लिए शासकीय राशि से कराया गया, उस पर निजी कब्जा कैसे हो गया? यदि तस्वीरों में दिखाई दे रही स्थिति वास्तविक है, तो यह पंचायत की कार्यप्रणाली और शासकीय संपत्ति के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
शासकीय राशि से निर्माण, निजी उपयोग क्यों?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यात्री प्रतीक्षालय के निर्माण के बाद इसका उपयोग यात्रियों के लिए होने के बजाय निजी व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। भवन के अंदर बड़ी मात्रा में दुकान का सामान और अन्य सामग्री रखी दिखाई दे रही है, वहीं बाहर भी व्यावसायिक गतिविधियां नजर आ रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इसकी जानकारी नहीं है? यदि जानकारी है तो अब तक शासकीय भवन को खाली क्यों नहीं कराया गया?
राशि जारी होने की प्रक्रिया पर भी सवाल !
मामले में यह भी जांच का विषय है कि यात्री प्रतीक्षालय के निर्माण के लिए स्वीकृत राशि किस योजना या मद से जारी हुई, निर्माण किस एजेंसी ने कराया और निर्माण पूर्ण होने के बाद उपयोगिता एवं भौतिक सत्यापन किस स्तर पर किया गया।
यदि निर्माण कार्य के नाम पर शासकीय राशि खर्च की गई और भवन का वास्तविक उपयोग यात्रियों के बजाय निजी दुकान के रूप में हो रहा है, तो जिम्मेदारों की भूमिका की जांच आवश्यक है।
आखिर किसे फायदा पहुंचाने की कोशिश?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आम यात्रियों की सुविधा के लिए बनाए गए यात्री प्रतीक्षालय को निजी दुकान में तब्दील करने की अनुमति आखिर किसने दी? क्या पंचायत ने किसी व्यक्ति को इसका उपयोग करने की अनुमति दी है या फिर बिना अनुमति के शासकीय संपत्ति पर कब्जा किया गया है?
मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि 7 लाख रुपये की शासकीय राशि से बने इस भवन का निजी उपयोग किसकी अनुमति से हो रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में जांच कर शासकीय संपत्ति को कब्जामुक्त कराता है या फिर यह मामला भी जिम्मेदारों की अनदेखी के बीच दबकर रह जाता है।

