छत्तीसगढ़ (समाचार मित्र) हरतालिका तीज का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-शांति की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति की इच्छा से इस व्रत को श्रद्धा के साथ करती हैं।
14 सितंबर 2026 को हरतालिका तीज का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। यह दिन माता पार्वती की तपस्या, भगवान शिव के प्रति उनकी अटूट आस्था और वैवाहिक जीवन में प्रेम एवं समर्पण की भावना को याद करने का अवसर भी है। सुहागिन महिलाएं जहां अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना करेंगी, वहीं अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर के लिए माता पार्वती का आशीर्वाद मांगेंगी।
इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं में इस व्रत को प्रेम, दांपत्य सुख और सौभाग्य से जोड़कर देखा गया है। महिलाएं दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को विधि-विधान से शिव-पार्वती का पूजन करती हैं।
तृतीया तिथि को लेकर क्या है नियम?
पंचांग के अनुसार इस बार तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह 7:15 बजे शुरू होगी और 14 सितंबर की सुबह 7:29 बजे तक रहेगी। ऐसे में तीज व्रत को लेकर तिथि के निर्धारण में उदयकाल का विशेष महत्व है। जिस दिन सूर्योदय के समय तृतीया तिथि मौजूद रहती है, उस दिन हरतालिका तीज का व्रत करना उचित माना जाता है। इसी वजह से इस वर्ष व्रत के लिए 14 सितंबर की तारीख निर्धारित है।
तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेंगी। इसके बाद पूरे दिन भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करते हुए व्रत रखा जाएगा। परंपरा के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत निर्जला रखा जाता है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर व्रत की कठिनता को लेकर अपनी स्थिति के अनुसार निर्णय लेना उचित है।
आखिर माता पार्वती ने क्यों रखा था ऐसा कठिन व्रत?
हरतालिका तीज से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा माता पार्वती और भगवान शिव से संबंधित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने लंबे समय तक कठोर तपस्या की।
कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठिन साधना और उपवास किया। उनकी तपस्या, दृढ़ संकल्प और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
हरतालिका तीज की कथा इसी प्रसंग से जुड़ी मानी जाती है। इसलिए इस दिन महिलाएं माता पार्वती को आदर्श पतिव्रता और तपस्या की शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजती हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक तीज व्रत करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और समर्पण बढ़ता है।
हरतालिका नाम के पीछे क्या है कहानी?
‘हरतालिका’ शब्द भी तीज की पौराणिक कथा को अपने भीतर समेटे हुए है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती को उनकी सखियां उस समय अपने साथ ले गई थीं, जब उनके पिता उनके विवाह को लेकर अलग निर्णय करना चाहते थे। माता पार्वती की इच्छा भगवान शिव को पति के रूप में पाने की थी।
इसी प्रसंग से ‘हरतालिका’ नाम जुड़ा माना जाता है। इसलिए हरतालिका तीज केवल व्रत का पर्व नहीं, बल्कि स्त्री के संकल्प, आस्था और अपने मनचाहे जीवनसाथी के लिए की गई तपस्या का भी प्रतीक माना जाता है।
प्रदोष में शिव-पार्वती के साथ गणेश जी की भी आराधना
तीज के दिन शाम के समय पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा स्थल को साफ करेंगी और वहां भगवान शिव, माता पार्वती तथा भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करेंगी।
कई स्थानों पर मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा भी है। इसके बाद भगवान गणेश का पूजन करके शिव-पार्वती की आराधना की जाती है।
पूजा में रोली, अक्षत, फूल, फल, धूप, दीप, नैवेद्य और अन्य पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है। सुहागिन महिलाएं माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित कर अपने पति की दीर्घायु और दांपत्य जीवन की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।
पूजन के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में प्रेम बनाए रखने की कामना की जाती है।
तीज की रात क्यों खास है?
हरतालिका तीज के व्रत में केवल दिनभर उपवास ही नहीं, बल्कि रात्रि पूजा और जागरण की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। शाम की पूजा के बाद महिलाएं तीज की कथा सुनती और सुनाती हैं।
इसके बाद भजन-कीर्तन और शिव-पार्वती का स्मरण करते हुए रात्रि जागरण किया जाता है। धार्मिक मान्यता में इसे माता पार्वती की तपस्या और उनकी अटूट भक्ति से जोड़कर देखा जाता है।
तीज की रात महिलाएं अपने श्रृंगार और पूजा सामग्री के साथ विशेष रूप से तैयार होती हैं। कई जगहों पर महिलाएं समूह में एकत्र होकर तीज के गीत गाती हैं और पर्व की खुशियां मनाती हैं।
अगले दिन इस तरह होगा व्रत का समापन
हरतालिका तीज का व्रत अगले दिन यानी 15 सितंबर 2026 को पारण के साथ पूरा किया जाएगा। रात्रि जागरण के बाद सुबह स्नान और पूजा-अर्चना करने के पश्चात व्रत खोलने की परंपरा है।
पारण से पहले भगवान शिव और माता पार्वती को भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद व्रती महिलाएं अन्न-जल ग्रहण करती हैं। हालांकि पारण का स्थानीय समय और विधि अलग-अलग परंपराओं के अनुसार हो सकती है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग या विद्वान पंडित से सही समय की पुष्टि करना बेहतर रहेगा।
सुहागिनों के लिए तीज का क्या है महत्व?
हरतालिका तीज को विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। महिलाएं नए कपड़े पहनती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। इसके बाद माता पार्वती की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।
कुंवारी कन्याओं के लिए भी यह पर्व महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ माता पार्वती की पूजा करने से उन्हें मनचाहा और योग्य जीवनसाथी मिलने का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है। हालांकि धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित हैं और इनके परिणामों को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
तीज पर किन बातों का रखें ध्यान?
हरतालिका तीज के दिन पूजा से पहले घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। व्रत रखने वाले लोगों को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। निर्जला व्रत कठिन होता है, इसलिए गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को बिना चिकित्सकीय सलाह के कठिन उपवास नहीं करना चाहिए।
पूजा के दौरान शिव-पार्वती की आराधना के साथ तीज व्रत की कथा सुनना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। दिनभर मन को शांत रखते हुए भगवान का स्मरण करना और शाम को विधिपूर्वक पूजा करना इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल है।


