कोरबा (समाचार मित्र) जिले के दीपका स्थित लाइफ केयर हॉस्पिटल में सामने आए 15 साल पुराने अवैध गर्भपात मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को आंशिक रूप से बदलते हुए तीन चिकित्सकों को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत दोषी करार दिया है।
मामला वर्ष 2011 में अस्पताल में मिले 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण और गर्भपात से जुड़े उपकरणों की बरामदगी से संबंधित है।
अस्पताल में मिले थे 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण !
मिली जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला 7 अगस्त 2011 का है। उस समय कोरबा के तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और कटघोरा एसडीएम ने दीपका स्थित लाइफ केयर हॉस्पिटल में छापेमारी की थी। कार्रवाई के दौरान अस्पताल में अलग-अलग बोतलों में 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण बरामद किए गए थे। जांच के दौरान अस्पताल से कुछ एक्सपायर्ड दवाएं और गर्भपात में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण भी मिले थे। इसके बाद मामले में संबंधित चिकित्सकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई थी।
निचली अदालत ने तीनों डॉक्टरों को किया था बरी !
मामले की सुनवाई कठघोरा के अपर सत्र न्यायालय में हुई थी। सुनवाई के बाद अदालत ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथिलेश प्रसाद और रेणू श्रीवास्तव को बरी कर दिया था। निचली अदालत के इस फैसले को राज्य शासन ने चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
वैध चिकित्सीय जरूरत साबित नहीं कर सके : हाईकोर्ट
अपील पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में आंशिक बदलाव किया। कोर्ट ने तीनों चिकित्सकों को एमटीपी एक्ट के तहत दोषी करार दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि, आरोपी डॉक्टर यह साबित करने में नाकाम रहे कि अस्पताल में मिले 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण किसी वैध चिकित्सीय आवश्यकता के तहत सद्भावनापूर्वक रखे गए थे।
15 साल बाद मामले में आया अहम फैसला !
करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले के बाद तीनों चिकित्सकों की कानूनी स्थिति बदल गई है। वर्ष 2011 में हुई छापेमारी से शुरू हुआ यह मामला पहले निचली अदालत में चला, जहां आरोपियों को राहत मिली थी। राज्य शासन की अपील के बाद अब हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को आंशिक रूप से बदलते हुए तीनों को एमटीपी एक्ट के तहत दोषी माना है।


