नई दिल्ली ( समाचार मित्र) सोशल मीडिया की तेज रफ्तार दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अब ठोस जवाब मांगा है। अदालत का सवाल सिर्फ आपत्तिजनक सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि ऐसी सामग्री सामने आने के बाद संबंधित एजेंसियों को सूचना कितनी तेजी और किस व्यवस्था के तहत दी जा रही है। इसी मुद्दे पर केंद्र को दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों से संबंधित यौन शोषण एवं अश्लील सामग्री (CSAM/CSEAM) की मौजूदगी और उसकी रिपोर्टिंग व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 24 सितंबर को केंद्र को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत काउंटर/रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। मामला अब 15 अक्टूबर को सूचीबद्ध होगा।
अदालत ने साफ किया कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद अब तक रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं आई है। 14 अगस्त 2026 के आदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून एवं न्याय मंत्रालय को मामले में जवाब देने के लिए कहा गया था। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को बताया कि सरकार रिपोर्ट तैयार कर रही है और जल्द दाखिल करेगी।
पीठ ने यह भी जानना चाहा कि सोशल मीडिया कंपनियों के साथ इस विषय पर सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं। अदालत की चिंता इस बात को लेकर है कि भविष्य में ऐसी सामग्री प्लेटफॉर्म पर दिखाई ही न दे और अगर सामने आती है तो उसके खिलाफ रिपोर्टिंग तथा जांच की प्रक्रिया में कोई खामी न रहे।
सिर्फ कंटेंट हटाना काफी नहीं
मामले में हस्तक्षेप की मांग करने वाले संगठन ने प्रस्तावित Standard Operating Procedure (SOP) को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। उसका तर्क है कि किसी डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं होना चाहिए कि सामग्री किसने अपलोड की या कहां से प्रसारित हुई। साथ ही यह भी पता लगाना जरूरी है कि सामग्री में दिख रहा बच्चा कौन है, वह सुरक्षित है या नहीं और क्या उसे तत्काल संरक्षण की जरूरत है।
यही पहलू इस मामले को केवल सोशल मीडिया मॉडरेशन से आगे ले जाता है। आवेदन में कहा गया है कि ऑनलाइन सामग्री की पहचान और उसके स्रोत की जांच के साथ-साथ बच्चे की पहचान, बचाव, जांच और पुनर्वास की प्रक्रिया भी सक्रिय होनी चाहिए
2024 के फैसले की अहम भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 के अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 79 के तहत मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा किसी सोशल मीडिया इंटरमीडियरी को POCSO कानून के तहत जिम्मेदारी से स्वतः मुक्त नहीं करती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) को रिपोर्ट करना भारत में पुलिस या Special Juvenile Police Unit को रिपोर्ट करने की वैधानिक जिम्मेदारी का विकल्प नहीं है।
मौजूदा कार्यवाही इसी पुराने फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने, केंद्रीकृत रिपोर्टिंग व्यवस्था तैयार करने और सामग्री की पहचान, संरक्षण, जांच तथा रिपोर्टिंग के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाने से जुड़ी है
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को प्रस्तावित SOP का मसौदा तैयार कर अदालत और केंद्र के साथ साझा करने की अनुमति भी दी है। केंद्र को यह रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम चार-पांच दिन पहले उपलब्ध करानी होगी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र को इसे अंतिम अवसर के तौर पर दो सप्ताह का समय दिया है।


