बिलासपुर (समाचार मित्र) छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने साफ कहा है, तहसीलदार या अन्य राजस्व अधिकारी सिविल कोर्ट की तरह अस्थायी या स्थायी निषेधाज्ञा जारी नहीं कर सकते। खासकर ऐसी जमीन, जिस पर स्थायी मकान बना हुआ है और विवाद स्वामित्व व कब्जे से जुड़ा है, उसमें निषेधाज्ञा देने का अधिकार केवल सक्षम सिविल कोर्ट को है
हाई कोर्ट ने महासमुंद तहसीलदार द्वारा निर्माण रोकने के लिए जारी अंतरिम आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए तहसीलदार महासमुंद द्वारा जारी आदेश को निरस्त कर दिया है।
पढ़िए क्या है मामला?
याचिकाकर्ता नीरज जैन व विकास चोपड़ा निवासी छत्तीसगढ़ महासमुंद ने अपनी याचिका में बताया हैख् महासमुंद स्थित खसरा नंबर 2052/1 की 0.131 हेक्टेयर तथा खसरा नंबर 2052/2 की 0.198 हेक्टेयर जमीन 27 अगस्त 2021 की पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से खरीदी थी। इसके आधार पर उन्हें भूमि पर भूमिस्वामी अधिकार मिला।
इसके बाद जगदीश प्रसाद अग्रवाल ने 9 दिसंबर 2021 को तहसीलदार के समक्ष आवेदन देकर याचिकाकर्ताओं द्वारा की जा रही निर्माण गतिविधि रोकने और आगे निर्माण नहीं करने देने की मांग को लेकर आवेदन पेश किया। तहसीलदार ने आवेदन पर राजस्व प्रकरण दर्ज कर याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ताओं ने शुरुआत में ही उठाया था अधिकार क्षेत्र का सवाल
याचिकाकर्ताओं ने तहसीलदार के समक्ष प्रारंभिक आपत्ति दाखिल कर कहा कि राजस्व न्यायालय को निषेधाज्ञा देने का कोई अधिकार नहीं है। जमीन के स्वामित्व और निर्माण रोकने जैसे विवाद का फैसला सिविल कोर्ट ही कर सकता है
उन्होंने यह भी बताया कि जगदीश प्रसाद अग्रवाल पहले इसी भूमि विवाद से संबंधित सिविल सूट, द्वितीय सिविल जज वर्ग-1, महासमुंद के न्यायालय में दाखिल कर चुके हैं, जिसे खारिज किया जा चुका है।
याचिकाकर्ताओं ने बताया, विवादित भूमि गैर-कृषि प्रकृति की है और उस पर आवासीय मकान बना हुआ है। इसलिए भी राजस्व न्यायालय को इस मामले में निषेधाज्ञा जारी करने का अधिकार नहीं था।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी आपत्ति पर फैसला नहीं
याचिकाकर्ताओं की प्रारंभिक आपत्ति का समय पर निराकरण नहीं होने पर उन्होंने हाई कोर्ट में दायर की।
हाई कोर्ट ने 4 फरवरी 2022 को तहसीलदार को आपत्ति पर कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया।
इसके बावजूद आपत्ति पर निर्णय नहीं होने पर याचिकाकर्ताओं ने न्यायालयीन आदेश की अवहेलना करने का आरोप लगाते हुए तहसीलदार के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की। अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए जब हाई कोर्ट ने जवाब पेश करने के लिए तहसीलदार को नोटिस जारी किया तब उसके बाद 25 अप्रैल 2022 को तहसीलदार ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आदेश पारित करते हुए निर्माण पर रोक लगा दी।
गलत खसरा नंबर की जमीन पर किया कब्जा
याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। प्रमुख पक्षकार जगदीश प्रसाद अग्रवाल की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, वह खसरा नंबर 2052/3 की 0.0680 हेक्टेयर भूमि के मालिक और कब्जाधारी हैं। उन्होंने यह जमीन 22 अक्टूबर 1988 को छेदीलाल निषाद से खरीदी थी। उनका आरोप था कि छेदीलाल निषाद की मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिसों ने खसरा नंबर 2052/1 और 2052/2 की जमीन याचिकाकर्ताओं को बेच दी, लेकिन याचिकाकर्ता अपनी जमीन की पहचान नहीं कर पाए और अब खसरा नंबर 2052/3 पर भी अधिकार जताते हुए निर्माण कर रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं ने पेड़ काटना शुरू कर दिया और बलपूर्वक उनकी जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया। इसी कारण तहसीलदार के समक्ष शिकायत की थी।
पुराने सिविल मुकदमे के फैसले ने बदल दी स्थिति
हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और पहले हुए सिविल मुकदमे के फैसले का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि जगदीश प्रसाद अग्रवाल ने पहले भी स्थायी निषेधाज्ञा के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था। 26 अप्रैल 2016 को द्वितीय सिविल जज वर्ग-1, महासमुंद ने उस मुकदमे का फैसला किया था। सिविल कोर्ट ने यह तथ्य दर्ज किया था कि खसरा नंबर 2052/3 खुली कृषि भूमि नहीं है। वहां प्रतिवादी का कब्जा था और उसने बाउंड्रीवाल तथा पक्का आवासीय मकान बना रखा था, जिसमें वह रह रहा था।
निषेधाज्ञा देने का अधिकार केवल सिविल कोर्ट को
हाई कोर्ट ने कहा कि स्थायी निर्माण और आवासीय मकान वाली जमीन के विवाद में राजस्व न्यायालय निषेधाज्ञा जारी नहीं कर सकता। स्वामित्व के निर्धारण के लिए विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 34 त अस्थायी और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए धारा 37 अ
39 तथा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39
नियम 1 और 2 के तहत अधिकार सिविल कोर्ट के पास है।
CPC की प्रक्रिया का इस्तेमाल शक्ति देने के लिए नहीं हो सकता
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व कानून में सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रक्रिया लागू होने का अर्थ यह नहीं है कि राजस्व अधिकारी को सिविल कोर्ट की सभी शक्तियां भी मिल जाती है। यदि राजस्व प्राधिकारी को निषेधाज्ञा देने की मूल शक्ति ही प्राप्त नहीं है, तो केवल सीपीसी की प्रक्रिया का हवाला देकर वह ऐसी शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सकता।
कोर्ट ने माना कि तहसीलदार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्माण रोकने का आदेश दिया था। वो ने इस टिप्पणी के साथ तहसीलदार द्वारा जारी स्थगन आदेश को रद्द कर दिया है।


