बिलासपुर (समाचार मित्र) छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस बीडी गुरु ने विभागीय जांच की प्रक्रिया में कर्मचारी को मिलने वाले वैधानिक बचाव के अधिकार को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 14 के तहत पहले कर्मचारी को आरोपों पर लिखित बचाव प्रस्तुत करने का अवसर देना जरूरी है। इसके बाद ही अनुशासनिक प्राधिकारी यह तय कर सकता है कि आरोपों की जांच स्वयं करेगा या जांच अधिकारी नियुक्त करेगा। हाई कोर्ट ने चार्जशीट जारी करने के साथ ही जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किए जाने को इस स्तर पर समय से पहले की कार्रवाई माना है।
पढ़िए क्या है मामला?
याचिकाकर्ता मनोज खरे, वर्तमान में नवा रायपुर में लैब अटेंडेंट के पद पर पदस्थ है। प्रारंभिक नियुक्ति 12 सितंबर 2011 को अस्थायी आधार पर हुई थी। बाद में उसकी सेवाएं 31 अक्टूबर 2013 से पुष्टि की गई। याचिका के अनुसार 14 वर्ष से अधिक सेवा पूरी करने के बाद भी उनके खिलाफ नियुक्ति के समय प्रस्तुत किए गए अनुभव प्रमाणपत्र को लेकर विभागीय कार्रवाई शुरू की गई।
पहली जांच के बाद सेवा समाप्त, हाई कोर्ट ने किया था निरस्त !
अनुभव प्रमाणपत्र को लेकर इससे पहले भी विभागीय कार्यवाही की गई थी। 9 दिसंबर 2024 को जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई और इसके आधार पर विभाग ने 15 मई 2025 को मनोज खरे की सेवाएं समाप्त कर दी थी। मनोज खरे ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त कर दिया था। हालांकि, विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट दी थी।
विभाग ने जारी कर नए सिरे से शोकॉज नोटिस
हाई कोर्ट से मिली छूट के बाद विभाग ने नया शो-कॉज नोटिस जारी किया। कर्मचारी ने उसका जवाब भी प्रस्तुत किया। लेकिन इसके बाद विभाग ने 16 जुलाई 2026 को फिर विभागीय जांच शुरू करने का आदेश जारी कर दिया।
चार्जशीट के साथ ही जांच और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त !
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने पैरवी करते हुए कहा, विभाग ने नियम 14 और 15 का पालन नहीं किया है। चार्जशीट जारी करने के साथ ही जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति कर दी गई, जबकि कर्मचारी को पहले आरोपों के संबंध में लिखित बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए था। सीनियर एडवोकेट ने कहा, लगभग उन्हीं मूल आरोपों पर पहले ही विभागीय जांच हो चुकी है और हाई कोर्ट पहले की सेवा समाप्ति को निरस्त कर चुका है। ऐसे में नए सिरे से कार्रवाई भी निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ही होनी चाहिए।
राज्य ने कहा- नई जांच पर कोई रोक नहीं !
राज्य सरकार ने कहा कि पहले की सेवा समाप्ति का आदेश हाई कोर्ट ने निरस्त करते हुए विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई की स्वतंत्रता दी थी। इसलिए वर्तमान जांच को अवैध रूप से दोहराई गई जांच नहीं कहा जा सकता।
राज्य ने यह भी कहा कि नियुक्ति के समय दिए गए अनुभव प्रमाणपत्र से जुड़ा आरोप गंभीर है और इसकी वास्तविकता नियमित विभागीय जांच में तय की जानी आवश्यक है। जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति से कर्मचारी को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ है तथा वह जांच अधिकारी के समक्ष अपना बचाव प्रस्तुत कर सकता है।
हाई कोर्ट ने नियम 14 की प्रक्रिया समझाई !
याचिका की सुनवाई जस्टिस बीडी गुरु के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने नियम 14 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि बड़ी सजा देने की विभागीय कार्रवाई में निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। नियम 14(4) के तहत आरोपों के विवरण मिलने के बाद सरकारी कर्मचारी को निर्धारित अवधि में लिखित बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना है। इसके बाद नियम 14(5) के तहत अनुशासनिक प्राधिकारी कर्मचारी के लिखित बचाव पर विचार करता है और फिर तय करता है कि आरोपों की जांच स्वयं की जाए अथवा जांच अधिकारी नियुक्त किया जाए।
जवाब सुने बिना नियुक्ति को बताया समय से पहले !
हाई कोर्ट ने पाया कि इस मामले में 16 जुलाई 2026 के आदेश के साथ ही चार्जशीट, जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति कर दी गई, जबकि उससे पहले याचिकाकर्ता को अपना लिखित बचाव प्रस्तुत करने और अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा उस पर विचार करने का अवसर नहीं दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति समय से पहले की गई कार्रवाई है। विभाग को पहले नियम 14 में निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए थी।
16 जुलाई का आदेश आंशिक रूप से निरस्त, जांच पर रोक नहीं !
हाई कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 के आदेश को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जिसमें उसी चरण पर जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किए गए थे।
हालांकि, कोर्ट ने विभाग को कर्मचारी के खिलाफ कानून के अनुसार आगे कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है। मनोज खरे को हाई कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने से 15 दिन के भीतर आरोपों पर अपना लिखित बचाव प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद अनुशासनिक प्राधिकारी को उस जवाब पर विचार कर नियम 14(5) के तहत उचित निर्णय लेना होगा और आगे की विभागीय कार्रवाई कानून के अनुसार करनी होगी।


