छत्तीसगढ़/बिलासपुर (समाचार मित्र) बिलासपुर पति-पत्नी के रिश्तों और पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर अदालत की तरफ से एक बहुत ही स्पष्ट और बड़ा संदेश सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने एक ताजा फैसले में यह साफ कर दिया है कि यदि कोई पति अपनी बहुत बुजुर्ग और बीमार मां को अकेले छोड़कर अलग घर में रहने से मना करता है, तो उसके इस कदम को किसी भी हाल में पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शादी होने से इंसान के पारिवारिक रिश्ते और कर्तव्य अपने माता-पिता के लिए समाप्त नहीं हो जाते हैं।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की बेंच ने एक शख्स द्वारा दायर की गई अपील पर सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें पति की तलाक की याचिका को ठुकरा दिया गया था। अदालत ने मामले की गंभीरता को समझते हुए पति की अपील मंजूर कर ली और दोनों के बीच के वैवाहिक रिश्ते को कानूनी रूप से भंग करने का आदेश दे दिया।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में माना कि अमूमन एक नए घर की मांग को हमेशा क्रूरता नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कई बार जीवनसाथी के पास स्वतंत्र आवास चाहने के जायज कारण हो सकते हैं। हालांकि, यह भी देखना जरूरी होता है कि क्या ऐसी जिद किसी अपने को उसके मां-बाप से अलग करने या रिश्ते तोड़ने के लिए एक अनुचित दबाव तो नहीं है। इस मामले में चूंकि पति की मां काफी बूढ़ी और बीमार थीं, इसलिए पति का अपनी मां से दूर जाने से इनकार करना कोर्ट को बिल्कुल भी अस्वाभाविक या अनुचित नहीं लगा।

