छत्तीसगढ़/रायपुर (समाचार मित्र) हलषष्टी जिसे हलछठ हरछठ ललही छठ या कमरछठ भी कहा जाता है सनातन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार है। यह पर्व हर साल भाद्रपद (भादों) महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो श्री कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले आता है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु,अच्छी सेहत और समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं।
केपिटल बिल्डकॉन इंप्रेशिया ई-३ में महिला मंदिर समिति के महिलाओं द्वारा अर्थेश्वर महादेव मंदिर में बड़े हर्षोल्लास पूर्वक पुजन किया गया ।
हलषष्ठी से जुड़ी मुख्य बातें और नियम
बलराम जयंती का उत्सव धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि को भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई श्री बलराम जी (बलदाऊ) का जन्म हुआ था। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और ‘मूसल’ है, इसलिए इस दिन कृषि उपकरणों और हल की विशेष पूजा की जाती है।
गाय की चीजों का निषेध हलषष्ठी के व्रत में गाय के दूध दही, घी या छाछ का उपयोग पूरी तरह वर्जित होता है। इस दिन केवल भैंस के दूध और उससे बने उत्पादों का ही सेवन व पूजा में इस्तेमाल किया जाता है।
हल जुता हुआ अन्न मना है: व्रती महिलाएं इस दिन ऐसे किसी भी अनाज या सब्जी का सेवन नहीं करतीं जिसे उगाने के लिए जमीन पर हल चलाया गया हो। इस दिन बिना हल जुते उगने वाले पसही चावल (तिन्नी का चावल) और महुए का सेवन करके व्रत खोला जाता है

पूजन विधि: महिलाएं आंगन में छोटा सा कृत्रिम तालाब (खमर) बनाकर उसमें झरबेरी, पलाश और कांस के पत्ते लगाती हैं। इसके बाद हलषष्ठी माता की छह पौराणिक कहानियां सुनी जाती हैं।

